Wednesday, 28 December 2011

वाह री दिल्ली कि सर्दी

वैसे देखा जाये तो ऐसे बहुत से शहर हैं जहाँ सर्दी बहुत पड़ती है, लेकिन दिल्ली की सर्दी तो बहुत मशहूर है |  यहाँ तक कि इस पर एक गाना भी बन  चुका है "दिल्ली की सर्दी" |


 दिल्ली कि सर्दी तो भैया गजब ही ढा देती है | दिसम्बर-जनवरी के महीनो में तो ओह हो क्या कहें - सुबह सुबह 5 से 7 तक जो धुंद देखने को मिलती है ऑफ हो | उस धुंद को देखते हुए तो और भी सर्दी लगने लगती है |


लेकिन जरूरी नहीं है कि रोज़ रोज़ गहरी धुंद के साथ ही ठण्ड पड़े, कभी कभी धुंद न होने के बावजूद, ठंडी शीत कि लहरें इतनी सर्द लगती हैं कि क्या कहें |




 चारों तरफ जहाँ भी देखो सड़कों पर लोग आग जलाए घेर के खड़े हुए मिलते हैं | सभी लोग जितना अपने आप को ढक पाएं सर्दी से बचने के लिए ढक लेते हैं | जाकिट , स्वेअटर, गले में मफ्फ्लर , सर पर टोपी लगाये, शाल लपेटे हुए लोग घरो से बहार निकलते हैं | सभी लोगो अपने अपने काम के लिए निकलते हैं , अब क्या करें भैया सर्दी हुई तो क्या हुआ काम तो करना ही पड़ेगा न | स्कूल ओं  में तो इस समय छुट्टियाँ हुआ करती हैं, बस दफ्तर वालो, दुकानदारों और बाकी काम काजी वालो को ही निकलना पड़ता है |


 ऑफिस में तो काम करने का भी मन नहीं होता जब ठण्ड बहुत ज्यादा लगने लगती है, हाथ ठन्डे पड़ जाते हैं चाहे जितना भी कुछ पेहेन लो, चाहे जितना भी ढक लो शरीर को इस दिल्ली कि सर्दी से छुटकारा ही नहीं मिलता और जहाँ भी थोड़ी गर्माहट मिली तो नींद सी आने लगती है | कहीं एक जगह बैठ जायें तो फिर वहां से उठने का मन ही नहीं करता, वो जगह जो गरम हो जाती है, उठ ने लगे तो ठण्ड फिर से लगने लग जाती है | जैसे कि अपने ऑफिस के मिश्रा जी जिन्हें थोड़ी गर्माहट मिली तो बस लगे नींद मारने बैठे-बैठे ही अपनी कुर्सी पर सोने लगते हैं और उनके सामने कंप्यूटर चलता रहता है, उनको जगाओ तो थोड़ी देर काम किया और जब फिर गर्माहट मिली तो फिर से चालू |





लेकिन बड़े बड़े दफ्तरों में तो फिर भी ए. सी. चलाकर गरम वातावरण बना लिया जाता है, लेकिन उनका क्या जो गरीब हैं, जिनको तन ढकने के लिए कुछ नहीं मिलता उन पर तो ऐसी सर्दी जुल्म ढाती है | इसलिए अगर बस में हो तो ऐसी सर्दी में कम्बल वगेरा दान करने चाहिए बहुत पुण्य मिलता है, बहुत दुआएं मिलती हैं | 

No comments:

Post a Comment